Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणो नाणुरप्यस्ति सगैर्निर्विवरो न यः ।
न च क्वचन सर्गास्ते सन्ति ब्रह्मखमेव तत् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
सूक्ष्मभूतरूप उपाधि से युक्त हिरण्यगर्भ का भी ऐसा कोई अणु नहीं है, जो सृष्टियों
से भरा हुआ न हो, लेकिन उसमें भी वही स्थिति है । वास्तव में तो उनमें कहीं भी सर्ग नहीं
है, किन्तु ब्रह्म ही ब्रह्म है