Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
द्वैतमैक्यं च यत्रास्ति न मनागपि तत्र ते ।
सर्गब्रह्मादिशब्दार्थाः कथं कस्येव भान्तु के ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
फरमार्थदशा में सर्ग ओर ब्रह्म आदि थब्दार्थों का भेद भले ही न हो, क्योकि उस्र दशा में द्वैत
ओर ऐक्य रहता ही नहीं / परन्तु व्यवहारदशा मे तो ब्रह्म एक हैं और सर्ग अनेक हैं; अतः ब्रह्म और
सर्ग शब्दों का भिन्न अर्थ होने के कारण वे भिन्नार्थकर क्यो नहीं होगे, इस पर कहते हैं /
भद्र, जिस व्यवहारदशा में द्वैत और एकत्व विद्यमान है, उस दशा में भी सर्ग और ब्रह्मशब्द के
अर्थ तो तनिक भी नहीं भासते, क्योंकि इस पर प्रश्न यह होगा कि कया द्वेतात्मक द्रष्टा को वे अर्थ
भासते हैं, या अद्वैतात्मक द्रष्टा को ? प्रथमपक्ष तो अयुक्त है, क्योंकि अज्ञानी द्वैतात्मक द्रष्टा को
वे किसी हालत में भी नहीं दीख पड़ेंगे । दूसरा पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योकि उस पक्ष में
अद्वैतात्मक वस्तु को वे किसकी तरह दीख पड़ेंगे, कौन किस स्वभाव के मालूम पड़ेंगे, यह कहना
होगा, परन्तु यह कह नहीं सकते, क्योकि अद्वैत स्थिति मेँ भान ओर भासित होनेवाले में कोई भेद
नहीं कहा जा सकता