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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

सर्वथा सर्वदा सर्वं सर्वं सर्वत्र सर्वदा । सदित्येव स्थितं सत्यं समं समनुभूतितः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, सब कुछ सब जगह सभी प्रकार से सत्‌ है और सब कुछ सब जगह सदा ही सत्‌ है-यह जो विषय प्रस्तुत हुआ था उसका अच्छे अनुभव से यदि विचार किया जाय, तो सम, अविषम एवं एकरस ही पर्यवसित (सिद्ध) होता है, अतः सत्यस्वरूप ही है, क्योकि जितने धर्म या धर्मी हैं, उनका देश, काल और वस्तुरूप से यदि सर्वात्मकता बन जाय, तो भेद और भेदकत्व आदि की सिद्धि नहीं हो सकती