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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अहो नु विततोदारा विमला विपुलाचला । भवता भगवन्भूत्यै भूयो दृष्टिरुदाहृता ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रासंगिक जो जीवन्मुक्त पुरुष के अहंकार की अबाधकता थी, उसका समर्थन किया ग्या, अव प्रक्रत सर्वत्र सर्वथा स्र्वव्‌ (सवक जगह सब प्रकार से सव कु है /) इस अर्थक पाषाणाख्यायिका द्वारा जो प्रतिज्ञा की थी, उसे पूछने के लिए भूमका बोधते है/ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, अहो, आपने मेरे उत्कर्ष के लिए फिर एक दृष्टि का (विज्ञान का) उपदेश दिया, यह विज्ञान व्यापक और महान्‌ उदार है, विमल है, विपुल ओर अचल है

सर्ग सन्दर्भ

सत्तावनवाँ सर्ग समाप्त अड्डावनवाँ सर्ग सम्पूर्ण सृष्टि की शोभा सभी जगह है और नहीं भी है, इस प्रकार का जो पाषाणाख्यायिका का अर्थ है, उसका दृष्टि भेद से वर्णन।