Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इमे सर्गा इदं ब्रह्म तेऽत्यन्तावाच्यदृष्टयः ।
विदार्यदारुरववद्भान्त्यर्थपरिवर्जिताः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, ये सर्ग और ब्रह्म आदि जो शब्द हैं, उनके विषय में यदि विचारा
जाय, तो अर्थ से शून्य होकर अत्यन्त अनिर्वचनीय वस्तु का बोध करानेवाले उस तरह दिखाई
देते हैं, जिस तरह कुठार से चिरे जानेवाले काठ में उसके बोधक जो भिन्न-भिन्न शब्द हैं,
वे पृथक् अर्थशून्य होकर केवल काठ वस्तु को बोध कराते दिखाई देते हैं इसका गम्भीर भाव
यह है कि पहले सर्ग शब्द और ब्रह्मशब्द के ऊपर विचार कर लेना चाहिए कि असल में उनसे
क्या अर्थ निकलता है । सर्जन क्रिया के कारण सर्ग शब्द है और बृंहण यानी वर्धन क्रिया के
कारण ब्रह्मशब्द है | सर्जन ओर वर्धन में तो कोई परस्पर भेद नहीं है, अतः ब्रह्म ओर सर्ग
आदि में भी भेद कैसे हो सकता है, अब इन सर्ग ओर ब्रह्मशब्द में भेद करनेवाला जो आनुपूर्वी
आदि धर्म हे, वह भी असल में तो कोई चीज है नहीं, अतः उससे रहित सर्ग और ब्रह्म आदि
शब्द लक्षणा से किसी अनिर्वचनीय अर्थ का ही बोध कराते है । अपितु क्रिया भी क्रियावान्
के स्वरूप से अलग नहीं है, यदि कहें कि क्रिया और क्रियावान् एक नहीं हैं, किन्तु एक आधार
ओर दूसरा आधेय है, अतः इसका भेद है, तो यह भी कहना ठीक नहीं है, क्योकि इनके
आधाराधेय भाव का निरूपण आप कर ही नहीं सकते । ऐसी परिस्थिति में कुठार से विदीर्ण
होनेवाले काठ में जो-जो काठ के लिए प्रसिद्ध शब्द हैं, वे सब पृथक् अर्थ से शून्य होकर जैसे
एक ही अर्थ के प्रतिपादक भासते हैं अथवा विदार्य (विदीर्ण करने योग्य) और दारु (विदीर्ण
होनेवाला) ये दो शब्द जैसे पृथक् अर्थ से शून्य होकर अभेदार्थ के ही प्रतिपादक हैं, वैसे ही
सर्ग और ब्रह्म आदि शब्द भी एकार्थ के यानी ब्रह्मार्थ के ही प्रतिपादक हैं