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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

नास्ति भूरणुमात्रापि सर्गैर्निर्विवरा न या । न च क्वचन विद्यन्ते सर्गा ब्रह्मखमेव ते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

आरोयद्रष्टि से शर्वो के प्रत्येक परमाणु में सबका आरोप कर सव कुछ देखा जा सकता हैं और अपवावद्वष्टि में उससे विपरीत भी देखा जा सकता हैं, इस आशय से कहते हैं । जो पृथ्वी सृष्टियों से गाढ़भरित (खूब भरी हुई) न हो, ऐसी अणुमात्र भी नहीं है यानी सारी पृथ्वी सृष्टियों से एकदम खचाखच भरी हुई ही है और सृष्टि भी कहीं नहीं है, किन्तु जो है, वे सब ब्रह्माकाशरूप ही है । आरोपदृष्टि से पृथ्वी के प्रत्येक परमाणु में सर्ग के सर्ग भरे पड़े हैं तथा अपवाद दृष्टि में न कोई परमाणु है और न उसमें सर्ग ही भरे पड़े हैं, केवल ब्रह्माकाशमात्र है