Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 46
पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग ध्यानरूपी कल्पद्रुम के फल का आस्वाद लेने पर मन की जैसी स्थिति होती है तथा विषयों से जैसा दृढ़ वैराग्य उत्पन्न होता है वह वर्णन ।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, परमार्थफल के साक्षात् अनुभूत होने तथा मुक्ति क…
- Verse 2तेलरहित दीपक के तुल्य पूर्वकाल की इसकी मृगता यानी विषयरूपी तृणों के अन्वेषण की स्वभावता न…
- Verse 3ध्यानरूपी वृक्ष को परमार्थरूप फल की प्राप्ति हो जाने पर बोधरूपता को प्राप्त यह मन वज्र के…
- Verse 4अवशिष्ट रह जाती है
- Verse 5जड़ देहादि के अविवेक से जड़ बनी हुई-सी जो चित्त की पहले सत्ता थी, वही अब देहादि का ठीक-ठी…
- Verse 6उस समय समस्त इच्छाओं से शून्य रहने के कारण कोई दूसरी गति न होने से वह आदि-अन्तशून्य आत्म-…
- Verse 7कब तक वह ध्यान रुप से अवयत नहीं होता, यह कहते हैं । जब तक उसे ब्रह्मज्ञान नहीं होता तथा ज…
- Verse 8परमार्थ स्वरूपता को प्राप्त करके तो वह मन न जाने कहाँ चला जाता है। उस समय वासना कहाँ रहती…
- Verse 9ऐसी दशा में योगी एकमात्र ध्यानैकनिष्ठ दिखाई देता है। वज के तुल्य दृढ़ समाधि में यह ऐसे स्…
- Verses 10–11ध्यान के समान ही उप्र योगी की समाधि भी अनायास चिद्ध ढो जाती है यह कहते हैं । सम्पूर्ण भोग…
- Verse 12उस योगी को परम वैराग्य भी अर्थतः सिद्ध हो जाता हैं, यह कहते हैं / निर्मल अन्तःकरणवाले योग…
- Verse 13वासनाशून्य होने के कारण सांसारिक पदार्थों को न देख रहा आत्मज्ञानी योगी तो वज के तुल्य अभे…
- Verse 14वर्षाकाल में नदी के प्रवाह के तुल्य एकमात्र आनन्दरस का आविर्भाव करानेवाली जो समाधि प्रथम…
- Verse 15सम्पूर्ण अर्थो की शान्ति देनेवाली हठात् प्राप्त हुई ध्यानदशा में ज्ञानबल से जबर्दस्ती जो…
- Verse 16इस तरह ध्यान की उपपत्ति भी विष्यो से विरक्ति होने पर ही होती हैं. अन्यथा नहीं: यह कहते है…
- Verse 17ऐसी स्थिति में वेराग्यरुपी बीज ही जब ऑकरित अवस्था मे स्थित रहता है तब ध्यान और जब प्ररूढ…
- Verse 18साक्षात्कारात्क कुति से आविशत ब्रह्म ही अविद्या का उच्छेदक होने के कारण ज्ञान कहा जाता है…
- Verse 19यह जो कुछ का वह सव विषय-वैरग्य से ही हो सकता है, दूसरे किसी प्रकार से नहीं; इसलिए विकय-वै…
- Verse 20भद्र, जो पुरुष विषयों के स्वाद से मुक्त है एवं विवेकज्ञान से सम्पन्न है उस महामुनि को निर…
- Verse 21जिसको विषय नहीं रुचता, उसीको तत्त्वज्ञ लोग ज्ञानी कहते हैं जब पुरुष को भोग नहीं रुचते तभी…
- Verse 22पूर्ण अद्रय स्वभाव से विरुद्ध भोग उसी समय में हो सकता हैं, जिस समय में अज्ञान के कारण आत्…
- Verse 23चाहिए, इस विषय में क्रम बतलाते हैं / भद्र, पहले गुरु, सहपाठी आदि के साथ वेदान्तश्रवण करे,…
- Verse 24यह सव होने पर भी समाधि की ओर प्रधान लक्ष्य रखना चाहिए, इस आशय से उपसहार करते हैं / हे श्र…