Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परमार्थफले ज्ञाते मुक्तौ परिणतिं गते ।
बोधोऽप्यसद्भवत्याशु परमार्थो मनोमृगः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, परमार्थफल के साक्षात् अनुभूत होने तथा मुक्ति
की दृढ़ स्थिति होने पर परम साक्षात्कारवृत्तिरूप बोध भी अपने उपादानभूत अज्ञान के बाध से
शीघ्र असद्रूप हो जाता है तथा मनरूप यह मृग भी परमपुरुषार्थरूप आत्मारूप ही हो जाता है
सर्ग सन्दर्भ
पैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त छियालीसवाँ सर्ग ध्यानरूपी कल्पद्रुम के फल का आस्वाद लेने पर मन की जैसी स्थिति होती है तथा विषयों से जैसा दृढ़ वैराग्य उत्पन्न होता है वह वर्णन ।