Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तदेतद्भोगवैतृष्ण्यं ध्यानमङ्कुरितं हि तत् ।
तदेव पीठबन्धेन बद्धं भवति बन्धुरम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में वेराग्यरुपी बीज ही जब ऑकरित अवस्था मे स्थित रहता है तब ध्यान और जब
प्ररूढ हो जाता हैं तब समाधिनाम से कहा जाता हैं, यों भेद में भी अभेद-व्यवहार हो सकता ढे
यह कथन फलित हुआ, यह कहते हैं ।
भद्र, विषयों से जो वैराग्य है वह अंकुरित होने पर ध्यान कहा जाता है और जब पीठ
बन्ध से यानी काण्डजनन आदि द्वारा दृढ़ बन्ध से सुन्दर बद्ध हो जाता है तब वही समाधि
नाम से कहा जाता है