Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
सर्वार्थशीतलत्वेन बलाद्ध्याने यदाऽऽगतम् ।
ज्ञानाद्विषयवैरस्य स समाधिर्हि नेतरः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पूर्ण
अर्थो की शान्ति देनेवाली हठात् प्राप्त हुई ध्यानदशा में ज्ञानबल से जबर्दस्ती जो विषयों के भीतर
वैराग्य आ जाता है वही समाधि है, दूसरी नहीं । रागादि के कारण खूब जल रहे चित्त में तो कभी
(79) मिठास के लोभ से जब चींटी गुड़ मँ जाकर चिपट जाती है तब फिर उससे अलग नहीं
होती । ठीक वही दशा योगी के मन की है । आनन्दैकरस का आविर्भाव करानेवाली समाधि का
आस्वाद लेकर योगी का मन पुनः उससे पृथक् नहीं होता यह तात्पर्य है।
भी किसी की समाधि नहीं देखी गयी है