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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

सम्यग्ज्ञानं समुच्छूनं सदैवोज्झिऽतवासनम् । ध्यानं भवति निर्वाणमानन्दपदमागतम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

साक्षात्कारात्क कुति से आविशत ब्रह्म ही अविद्या का उच्छेदक होने के कारण ज्ञान कहा जाता है वासना का उच्छेदक होने के कारण निर्वाण कहा जाता है, यह कहते हैं । साक्षात्कारात्मक वृत्ति में प्रतिबिम्बित ब्रह्म ही अविद्योच्छेदरूप होने से, निरन्तर परित्यक्त वासनारूप होने से तथा आनन्दपद को प्राप्त होने से सम्यक्‌ ज्ञान, ध्यान ओर निर्वाण रूप कहा जाता है