Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
सुविविक्ततया चित्तसत्ता बोधतयोदिता ।
अनाद्यन्ता भवत्यच्छप्रकाशफलदायिनी ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जड़ देहादि के अविवेक से जड़ बनी हुई-सी जो चित्त की पहले सत्ता
थी, वही अब देहादि का ठीक-ठीक परिज्ञान हो जाने के कारण निर्मलस्वरूप से स्थित हो मानों
बोधरूप से उदित हुई है, क्योंकि वह आदि और अन्त से शून्य, स्वच्छ आत्मप्रकाशरूपी फल
प्रदान करनेवाली है