Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
क्वापि सा मृगता याति प्रक्षीणस्नेहदीपवत् ।
परमार्थदशैवास्ते तत्रानन्तावभासिनी ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
तेलरहित दीपक के तुल्य पूर्वकाल की इसकी मृगता यानी विषयरूपी तृणों के अन्वेषण की स्वभावता
न जाने कहाँ चली जाती है । उस समय तो हे श्रीरामचन्द्रजी, अनन्त आत्मस्वरूप का प्रकाश
करनेवाली एकमात्र परमार्थदशा ही अवशेष रह जाती है