Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 216
दो सौ चौढहवाँ सर्ग समाप्त दो सौ पन्द्रहवाँ सर्ग तुम राम आदि के समान प्रबुद्ध होकर जीवन्मुक्त सुखी होओ यों श्री वाल्मीकिजी का अपने शिष्य भरद्राज को उपदेश देना ।
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- Verse 1श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे मेरे शिष्यो में सर्वश्रेष्ठ, हे महामते भरद्वाज, श्रीरामचन्द्रज…
- Verse 2वत्स, तुम भी इसी निर्दोष पूर्ण ब्रह्मात्मदुष्टि का दृढता से अवलम्बन कर सांसारिक सुखो से व…
- Verses 3–4यह मेरे द्वारा उपदिष्ट संसारनाशक ज्ञान दुष्टजनो की संगति से जिस प्रकार नष्ट न हो वैसे उसक…
- Verse 5हे पुत्र भरद्वाज, तुम स्वयं अपने विचार से ही रामचन्द्रजी आदि के समान पहले से ही जीवन्मुक्…
- Verse 6इस शास्त्र का परम पुरुषार्थरूप फल दृष्ट है, अतः यह सकल शास्त्रों से श्रेष्ठतम है ओर अभ्या…
- Verse 7हे साघो, जैसे श्रीवसिष्ठजी के उपदेशवचनों के हृदय में प्रसार से सकल सन्देहो के साथ अज्ञान…
- Verse 8नित्यसिद्ध ब्रह्मात्मभावरूप जीवन्मुक्तपद की प्राप्ति के लिये ओर लोगों को भी सतूसंगति, सत्…
- Verse 9तृष्णारूपी चमड़े की रस्सी से कसकर बँधी हुई अज्ञानी के हृदय में जमी हुई देह, इन्द्रिय आदिम…
- Verse 10हे पुत्रतुल्य कृपाभाजन भरद्वाज, ये मुक्ति के उपाय मन्द अधिकारी पुरुष भी यदि इनका श्रवणाभ्…
- Verse 11वक्ता (उपदेश देनेवाले) भी गुरुमुख से विचार कर ही सम्प्रदायतः अर्थ को भलीभाँति जानकर औरों…
- Verses 12–13अब अर्थबोध के विना ही ग्रन्थ के पारायण का, ग्रन्थ लेखन तथा वाचक को वृत्ति देकर व्याख्यान…
- Verse 14इस ग्रन्थ का ऐसा महाफल आपको कहाँ से ज्ञात हुआ ऐसी किसी को आशंका हो, तो इस पर कहते हैं। पु…
- Verses 15–16इस शास्त्र की समाप्ति होने पर गृह, अन्न, धन आदि का दान ब्राह्मणो को अवश्य देना चाहिये, ऐस…
- Verse 17हे भरद्वाज, तुम्हारी बुद्धि को बोध देने के लिये सैकड़ों कथाक्रमों से विशाल कलेवर हुआ यह श…
- Verse 1श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे राजन्, वसिष्ठजी का राम आदि के प्रति तथा अगस्त्यजी का सुतीक्ष्…
- Verse 2राजा (अरिष्टनेमि) ने कहा : भगवन्, आपकी जो कृपादृष्टि मुझ पर पडी है वह भवरूपी बन्धन का वि…
- Verse 3देवदूत ने कहा : तदुपरान्त ऐसा कहकर राजा के नेत्र आश्चर्य से विकसित हो गये । उसने मुझसे मृ…
- Verses 4–6राजा ने कहा : हे देवदूत, तुमको नमस्कार है, हे प्रभो, तुम्हारा कल्याण हो, सज्जन पुरुषों की…
- Verse 7सत्संग के कारण श्रवणलाम होने से मैं भी कृतकृत्य हो गया हूँ, ऐसा कहते है । पहले कभी मुझे य…
- Verse 8हे पापरहित (५) तदुपरान्त वाल्मीकिजी से आज्ञा लेकर मैं तुम्हारे निकट तुम्हें उपदेश देने के…
- Verses 9–10अप्सरा ने कहा : हे महाभाम्यशाली देवदूत, तुमको नमस्कार है, तुम्हारे द्वारा सुनाये गये इस अ…
- Verse 11अग्निवेश्य ने कहा : वत्स, तदुपरान्त वह सुरुचि नाम की अप्सरा गन्धमादन के समीप हिमालय के शि…
- Verse 12हे पुत्र, क्या तुमने श्रीवसिष्ठजी का उपदेशरूप यह शास्त्र सुना ? मोक्ष का साधन कर्म है अथव…
- Verses 13–14कारुण्य ने कहा : भगवन्, इस समय तत्त्वज्ञान होने से अतीत, अनागत और असंनिकृष्ट (दूरवर्ती)…
- Verse 15अगस्ति ने कहा : हे सुतीक्ष्ण, कृतकृत्य हुए अग्निवेश्य के पुत्र कारुण्य ने यह कहकर विवाह द…
- Verse 16हे सुतीक्ष्ण, ज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान के विषय में कर्म बन्धन का हेतु होगा, ऐसा सन्…
- Verse 17सन्देह के विषय विरुद्ध अनेक कोटिरूप सांसारिकपदार्थो का पारमार्थिक ब्रह्मतत्त्वरूप से सकलव…
- Verses 18–21सुतीक्ष्ण ने कहा : भगवन्, आपके अनुग्रह से मेरा अज्ञान ओर उसका कार्यरूप जगत् नष्ट हो गया…
- Verses 22–23इस समय गुरु द्वारा किये गये परमपुरुषार्थ देनेवाले ज्ञान के प्रदानरूप परम उपकार का जगत् म…
- Verse 24भगवन्, आपके असीम अनुग्रह से निस्सन्देह हो मै भवसागर से पार होकर पूणनिन्दरूप से सम्पूर्ण…
- Verses 25–27यह ग्रन्थ सकल उपनिषदो के सारभूत अर्थ का उपबृंहणरूप है अतः इसका मुमुश्षु पुरुषों को भी समा…