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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

अग्निवेश्य उवाच । ततः सा सुरुचिः श्रेष्ठा तमेवार्थमचिन्तयत् । स्थिता सा हिमवत्पृष्ठे समीपे गन्धमादने ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

वक्ता (उपदेश देनेवाले) भी गुरुमुख से विचार कर ही सम्प्रदायतः अर्थ को भलीभाँति जानकर औरों को सुनावे, उपदेश दें, तो उन्हे बोधरूप फल की प्राप्ति हो सकती है औरों को नहीं हो सकती, इस नियम को सूचित करते हुए कहते है । जो सन्त पुरुष इस ग्रन्थ को बहुश्रुत गुरुजनं के सामने स्वयं भलीर्भौति विचारकर उनके संवाद से जब यह ग्रन्थ भलीभाँति ज्ञात हो जाय तब पीछे स्वयं भी शुश्रुष (सुनने की इच्छा करनेवाले) लोगों को सम्प्रदायानुसार कहेंगे, उपदेश देंगे, तो वे मूर्खता (मूढता) अथवा पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होगे अवश्य ही तत्त्वज्ञानरूप फल को प्राप्त होगे । संप्रदाय के अनुसार न जाने गये वचनों के श्रवण अथवा दूसरों को श्रवण कराने से क्या प्रयोजन है ?