Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verses 18–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verses 18–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 18-21
संस्कृत श्लोक
सुतीक्ष्ण उवाच ।
नष्टमज्ञानतत्कार्यं प्राप्तं ज्ञानमनुत्तमम् ।
साक्षिणि स्फुरिताभासे ध्रुवे दीप इव क्रियाः ॥ १८ ॥
सति यस्मिन्प्रवर्तन्ते वित्तेहाः स्पन्दपूर्विकाः ।
कटकाङ्गदकेयूरनूपुरैरिव काञ्चनम् ॥ १ ॥
पयसीव तरङ्गाली यस्मात्स्फुरति दृश्यभूः ।
तदेवेदं जगत्सर्वं पूर्णे पूर्णं व्यवस्थितम् ॥ २० ॥
यथाप्राप्तोऽनुवर्तामि को लङ्घयति सद्वचः ।
भगवंस्त्वत्प्रसादेन ज्ञातज्ञेयोऽस्मि संस्थितः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
सुतीक्ष्ण ने कहा : भगवन्, आपके अनुग्रह
से मेरा अज्ञान ओर उसका कार्यरूप जगत् नष्ट हो गया है मुझे सर्वश्रेष्ठब्रह्मात्मैक्यरूप ज्ञान प्राप्त
हो गया है । जैसे नाट्यशाला में दीपक के रहने पर उसके प्रकाश के सहारे नट, नर्तक आदि की
नाचकूद, अभिनय आदि क्रियाएँ होती हैँ, वैसे ही जिस सबके साक्षी परमात्मा के स्वयं ज्योति होने
के कारण नित्य स्फुरित और निष्क्रियरूप से स्थित होने पर सब स्पन्द मूर्तियाँ (सचेष्ट मूर्तिर्या) तथा
लोकिक और वैदिक क्रियाएँ होती हैं एवं जैसे कांचन ही कड़ा, बाजूबंद, केयूर और नूपुरों के रूप
में स्फुरित होता है तथा जैसे जल में लहरें स्फुरित होती हैं वैसे ही जिससे यह दृश्य स्फुरित होता
है, यह सारा जगत् वही है उसमें पूर्णरूप से व्यवस्थित है, उससे रंचभर भी पृथक् नहीं है । ऐसा
विचारकर जिस आश्रम में जो व्यवहार जैसा प्राप्त है उस व्यवहार का अनुवर्तन (अनुसरण) करता
हूँ, सन्तों के वचन का कोन उल्लंघन कर सकता है ? भगवन्, आपके असीम अनुग्रह से मैं ज्ञातव्य
तत्त्व का भलीभाँति ज्ञान प्राप्त कर स्थित हूँ