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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verses 15–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

अगस्तिरुवाच । इत्युक्त्वा नाम कारुण्य अग्निवेश्यसुतः कृती । प्राप्तकर्मा यथान्यायं काले काले ह्युपाहरत् ॥ १५ ॥ संदेहोऽत्र न कर्तव्यः सुतीक्ष्ण ज्ञानकर्मणि । संशयाद्भ्रश्यते स्वार्थात्संशयात्मा विनश्यति ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस शास्त्र की समाप्ति होने पर गृह, अन्न, धन आदि का दान ब्राह्मणो को अवश्य देना चाहिये, ऐसा कहते हैं। बुद्धिमान्‌ पुरुषों को मोक्षोपायरूप इस कथाप्रबन्ध की समाप्ति होने पर प्रयत्नतः वक्ता को सुन्दर भवन देकर अभिमत अन्न, पान, दान द्वारा ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिये । दान आदि का कर्ता पुरुष शास्त्रानुसार स्वकृत पुण्य को उसके अनुरूप फलरूप से अवश्य प्राप्त होता है ऐसा समझकर अपनी शक्ति के अनुसार उन्हे अभीष्ट दक्षिणा आदि देना चाहिये