Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verses 25–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verses 25–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 25-26
संस्कृत श्लोक
यत्सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति च स्फुटम् ।
श्रुत्वा ह्युदीर्यते साम्नि तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ २५ ॥
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं श्रीवसिष्ठं नताःस्मः ॥ २६ ॥
अ इत्यार्षे श्रीवासिष्ठमहारामायणे वाल्मीकीये देवदूतोक्ते मोक्षोपायेषु निर्वाणप्रकरणे उत्तरार्धे बालकाण्डे ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह ग्रन्थ सकल उपनिषदो के सारभूत अर्थ का उपबृंहणरूप है अतः इसका मुमुश्षु पुरुषों को
भी समादर करना चाहिये यह सूचित करते हुए सर्व खल्विदं ब्रह्मतज्जलानिति शान्त उपासीत अर्थात्
यह सारा जगत् ब्रह्म से उत्पन्न होने, ब्रह्म मे लीन होने और ब्रह्म में स्थित होने के कारण ब्रह्म ही
है यो शान्त होकर उपासना करनी चाहिये इस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् में प्रदर्शित स्पष्ट उपायसहित
ज्ञान से ज्ञात सर्वात्मकसच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व का अनुसन्धान कर अन्त में मंगल के लिए
नमस्कार करते हैं।
जो ब्रह्म सामवेद में "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलान् इस श्रुति द्वारा अधिकारी पुरुषों के लिए हाथ
में रक्खे आँवले के समान प्रत्यक्षरूप से परमतात्पर्यतया उपदिष्ट है उस रूपसे अवशिष्ट प्रत्यक्
चिदानन्दघन परमात्मा को नमस्कार है । ज्ञानोपदेश द्वारा परमसुखदायक, अद्वितीय ज्ञानमूर्ति,
सुखदुःख आदि द्वन्द्रों से रहित, आकाशसदृश निर्मल, "तत्त्वमसि" आदि वेदान्तमहावाक्यों के
लक्ष्यार्थरूप, एक, निर्मल, निश्चल, सकलधीवृत्तियों के साक्षी, भावातीत, त्रिगुणरहित, ब्रह्मानन्दरूप
श्रीवसिष्ठजी को हम नमस्कार करते हैं