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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

श्रुतार्थं चिन्तयन्नत्र स्थास्यामि विगतज्वरः । इत्युक्तोऽहं ततो भद्रे परं विस्मयमागतः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस शास्त्र का परम पुरुषार्थरूप फल दृष्ट है, अतः यह सकल शास्त्रों से श्रेष्ठतम है ओर अभ्यास करने पर मन्द अधिकारियों को मुक्तिरूप परमपुरुषार्थ देने में समर्थ है, ऐसा दिखलाते हैँ । साक्षात्‌ परब्रह्मानुभूति प्रदान करानेवाले परम पुण्य इन मोक्षोपायों को यदि बालक भी सुने, तो वह भी तत्त्वज्ञानी हो जाय । आप जैसे मुख्य अधिकारी में ये फलोपधायक हैं, इसमें कहना ही क्या हे, इसके श्रवण से आप तो अवश्य तत्वज्ञानी हो गये हैं, यह भाव है