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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

देवदूत उवाच । इत्युक्त्वासौ ततो राजा विस्मयोत्फुल्ललोचनः । उवाच वचनं मां तु मधुर श्लक्ष्णया गिरा ॥ ३ ॥ राजोवाच । देवदूत नमस्तुभ्यं कुशलं चास्तु ते विभो । सतां साप्तपदं मैत्रमित्युक्तं तत्त्वया कृतम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यह मेरे द्वारा उपदिष्ट संसारनाशक ज्ञान दुष्टजनो की संगति से जिस प्रकार नष्ट न हो वैसे उसकी रक्षा करो, इस आशय से कहते है । हे पवित्रात्मा भरद्वाज, जैसे श्रीरामचन्द्रजी को वसिष्ठजी द्वारा उपदिष्ट ज्ञान दुःसंग तथा विषयभोग की आसक्ति से रहित रहा अतएव वह ज्यों-का-त्यों रहा यानी विकृत नहीं हुआ वैसे ही तुम्हारी बुद्धि भी (मदुपदिष्ट ज्ञान भी) यदि दुःसंग ओर विषयभोगासक्ति से शून्य रही तो घने अज्ञान में पड़ने पर भी तथा विमूढ होने पर भी वह नष्ट नहीं होगी । इसी प्रकार ये महामना दशरथ आदि राजा तथा रामचन्द्र आदि राजकुमार जीवन्मुक्ति पद को प्राप्त हुए