Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
कृतार्था वीतशोकास्मि स्थास्यामि विगतज्वरा ।
इदानीं गच्छ भद्रं ते यथेच्छं शक्रसंनिधौ ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे पुत्रतुल्य कृपाभाजन भरद्वाज, ये मुक्ति के उपाय मन्द अधिकारी पुरुष
भी यदि इनका श्रवणाभ्यास करें तो उनके भी अज्ञानान्धकार को हटाने की सामर्थ्य रखते हैं ऐसे
महामहिमाशाली इन मोक्षोपायों को गुरुमुख से जो अधिकारी श्रेष्ठ पुरुष सुनेंगे वे तत्त्वज्ञानियों में
श्रेष्ठतम होकर फिर भवचक्र में कदापि नहीं पड़ेंगे । यह मेरी संक्षिप्त रहस्य उक्ति है, इसके अतिरिक्त
कथन से क्या प्रयोजन हे ?