Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
कच्चिदेतच्छ्रुतं पुत्र वसिष्ठस्योपदेशनम् ।
तत्सर्वमवधार्याथ यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १२ ॥
कारुण्य उवाच ।
स्मृतिर्वाग्दृष्टिसत्ता च स्वप्ने वन्ध्यासुतेऽजले ।
मरीचिका यथा तद्वज्ज्ञानात्सांसारिकी स्थितिः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब अर्थबोध के विना ही ग्रन्थ के पारायण का, ग्रन्थ लेखन तथा वाचक को वृत्ति देकर व्याख्यान
कराने का फल कहते हैं।
जो व्युत्पत्ति न होने के कारण अर्थानुसन्धान के बिना तथा पारायण की दक्षिणा द्रव्य की अपेक्षा न
कर यानी निर्लोभि होकर पारायण करायेंगे अथवा जो पुस्तक लिखायेंगे, जो उत्तम तीर्थक्षेत्र में वृत्ति
बाँधकर व्याख्या करनेवाले पुरुष के साथ वाचक को नियुक्त करेंगे या केवल ही वाचक को नियुक्त
करेगे वे यदि सकाम होकर ये सब काम करेंगे तो राजसूय यज्ञ के फल से युक्त होकर बार-बार स्वर्ग
जायेंगे। यदि निष्काम होकर उक्त कार्य करेंगे तो उत्तम कुल में जन्म तथा सद्गुरु के मुखारविन्द से
सत्शास्त्र का श्रवण प्राप्त कर वैसे ही तीसरे जन्म में मोक्ष को प्राप्त होंगे जैसे कि पुण्यवान् पुरुष तीसरे
जन्म में लक्ष्मी को प्राप्त होते हें