Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
एतच्छ्रुत्वा मुनेर्वाक्यमनेकार्थैक्यबोधनम् ।
नमस्कृत्य गुरुं प्राह अन्तिके विनयान्वितः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भरद्वाज,
तुम्हारी बुद्धि को बोध देने के लिये सैकड़ों कथाक्रमों से विशाल कलेवर हुआ यह शास्त्र मैंने तुमसे
कहा, जिसमें ब्रह्मत्व का विस्तार से वर्णन है तथा जो दृष्टान्तयुक्तियों से सुशोभित हे । इसका
श्रवणकर जीते जी ही विमुक्ताशय होकर लोकानुग्रह के लिये ज्ञान, तपस्या ओर कर्मफल से युक्त
प्रारब्ध भोग के सत्कर्मो की फलरूप योग, ज्ञानसिदधि ओर एश्वर्य की अक्षय शोभा को भोगकर
पूर्णरूप से चिरविश्रान्ति को प्राप्त होओ