Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
इदानीं गच्छ भद्रं ते देवराजनिवेशनम् ।
अनेन श्रवणेनाहं निर्वृतो मुदितोऽपि च ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे पुत्र भरद्वाज,
तुम स्वयं अपने विचार से ही रामचन्द्रजी आदि के समान पहले से ही जीवन्मुक्त हो । आज इस मोक्ष
संहिता को सुनकर सचमुच मुक्ततर हो गये हो, क्योकि जिस शंकारूपी पंक की संभावना थी,
उसका भी इससे क्षालन हो गया