Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
ततो वाल्मीकिमापृच्छय आगतोऽस्मि त्वदन्तिके ।
एतत्ते सर्वमाख्यातं त्वया पृष्टं ममानघे ।
इतः परं गमिष्यामि शक्रस्य सदनं प्रति ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
नित्यसिद्ध ब्रह्मात्मभावरूप जीवन्मुक्तपद की प्राप्ति के लिये ओर लोगों को भी सतूसंगति, सत्तेवा,
सन्तो से पूछना आदि उपाय का आश्रय करना चाहिये, ऐसा कहते हैँ ।
सन्त महात्माओं की सतशिक्षा से, लोभ, आलस्य, निद्रा आदि से रहित सप्रेम निरन्तर सेवा से
तथा बोधोपायभूत कथाओं से भरे हुए उनके सदुपदेश से सावधान सन्मति अधिकारियों को ज्ञातव्य
आत्मतत्त्व वैसे ही ज्ञात हो जाता है जैसे कि श्रीवसिष्ठजी की सत्संगति से श्रीरामचन्द्र आदि को ज्ञात
हुआ