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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 2

पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्ग सम्पूर्ण जगत्‌ में शिवमयरूपता बतलाने के बाद कर्म के बीज का अन्वेषण करके उसका समूल निवारण किया जाता है, यह वर्णन ।

44 verse-groups

  1. Verse 1सर्व शिवमयं शान्तमनन्त प्राग्वदास्यताम्‌” (सक अज. शान्त, अनन्त तथा शिवमय ब्रह्म ही है, इस…
  2. Verse 2जो-जो चिति से भास्य हे कह सक विति का विवर्त होने से चिन्मय-विति-स्वरूप-ही ह उसे वार अन्तः…
  3. Verse 3डस प्रकार बराह् इन्द्रिय, इन्द्रियों से जनित ज्ञान तथा ज्ञान के जो विषय हैं उनमें भी चिद्…
  4. Verse 4इस्रीको फिर स्पष्टरूप से बतलाते हैं । हे श्रीरामजी, प्रमाता, प्रमेय ओर प्रमाण, देश, काल,…
  5. Verse 5अह ओर भम“ /मैं और मेरा) इन दो रुपों से ही सम्पूर्ण विवर्तो का संग्रहकर फिर ये सभी वस्तु व…
  6. Verse 6अनन्त कोटि जन्मों के सवित पाप और पुण्यरूफी कर्मो का अपरोक्षरूप से भान न होने के कारण शिवम…
  7. Verse 7स्रचमुच आपका नैष्कर्म्या सिद्ध हो जाय, यदि अज्ञानरूप मूल के साथ आप कर्मों का त्याय कर सके…
  8. Verse 8कर्म का विस्तार कैसा है, उसका मूल क्या है और उसके किस अंश का नाश किया जाता है ? यानी उसका…
  9. Verse 9श्रीरामजी ने कहा : हे भगवान्‌, जो नाशनीय अंश है, उसका भलीभाँति मूलोच्छेदपूर्वक नाश कर देन…
  10. Verse 10कर्म का स्वरूप ओर उसके नाश का प्रकार, जो अपने को अभिप्रेत है, श्रीरमजी बतलाते हैं / बुद्ध…
  11. Verse 11तीसरे प्रश्न का उत्तर कहते हैं हे ब्रह्मन्‌, कर्मरूपी वृक्ष के मूल मैं आपसे कहता हूँ, आप…
  12. Verse 12इस लोक के कर्मा का मूल शरीर ही पूर्वजन्म के कर्म का विस्ताररूप भी होता हैं, इस दूसरे प्रश…
  13. Verse 13सुख- दुःखरूपी नानाविध फलों की पंक्तियों से समन्वित इस वृक्ष का पूर्व जन्म में किया गया भल…
  14. Verse 14प्रत्येक क्षण में कालरूपी उग्र बन्दर हर्ष, विषाद, रोग, जरा आदि विकार की चेष्टाओं के द्वार…
  15. Verse 15अपनी वृद्धावस्थारूपी शिशिर ऋतु के अन्त में इसके चेष्टारूप पत्तों के समूह शान्त और शीर्णं…
  16. Verse 16हाथों ओर पैरों के पिले हिस्से तथा ओष्ठ, कान और जीभ आदि इसके लाल-लाल कोमल पल्लवरूप अवयव है…
  17. Verse 17भीतर में स्थित नाड़ियों तथा हड्डियों से लिप्त होने के कारण सुन्दर, कोमल ओर चिकनी मूर्ति ल…
  18. Verse 18काटने पर भी पुनः पुनः उत्पन्न होनेवाली कोमल, चिकनी, तीक्ष्ण अग्रभागों से युक्त दूज की चन्…
  19. Verse 19इस तरह देह वृक्षरूप से उत्पन्न हुए पूर्व जन्म के कर्म की कर्मेन्द्रियाँ ही मूल है । (इनमे…
  20. Verses 20–21हे भगवान्‌, दृढ़ हड्डियों की गाँठों से बंधी, नाड़ियों में भरे गये अन्नरसों में डूबी हुई,…
  21. Verse 22ज्ञानेन्द्रियाँ देह से बाहर बहुत दूर विषय प्रदेशों में जाकर भी विषयों को पकड़ लेने में अत…
  22. Verses 23–25उन ज्ञानेन्द्रियों का भी महान्‌ स्तम्भयुक्त मूल यह मन है, इसने तीनों लोक को व्याप्त कर रक…
  23. Verse 26हे भगवान्‌, उस मन का मूल तत्त्वज्ञानी लोग चेत्य (विषय) की ओर उन्मुख हुए चिदात्मक जीव को (…
  24. Verse 27हे मुने, सब कर्मो का आदि बीज यह जीव चेतन ही हे, क्योंकि उसके रहने पर ही यह बड़ी-बड़ी टहनि…
  25. Verse 28यह जीवचैतन्य जिस समय अहंकार आदि से युक्त भें ही चेतन कर्ता हूँ” इस तरह की उद्बुद्ध हुई शब…
  26. Verse 29फिर इसीको स्पष्टरूप से कहते हैं / यह जीवचेतन जब चेतनशब्दार्थ की भावना से यानी चैतन्यात्मक…
  27. Verse 30उक्त अर्थ की प्रामाणिकता की सिद्धि के लिए गुरुवाक्य को ही प्रमाणरुप से उपस्थित करते हुए श…
  28. Verse 31है श्रीरमजी, यह जो आपने कर्मो का मूल मुझे नाया है, इसका त्याग चुपचाप बैठे रहने या देह का…
  29. Verse 32देह के विद्यमान रहते बाह्य और आभ्यन्तर दृश्यों के अध्यास को दूर करना अत्यन्त ही कठिन हैं,…
  30. Verse 33यदि भावना नहीं करता, तो यह अच्छी तरह इस संसार के भ्रम से मुक्त हो जाता है । वह भ्रम सत्य…
  31. Verse 34यह जीवचेतन ही वासना, इच्छा, मन, कर्म, संकल्प आदि नामवाले ओपाधिक उत्पन्न भ्रमो से अपने अन्…
  32. Verse 35तब तो प्रतिकिम्ब की हेतु वित्तरप उपाधि का ही प्रकोध से निरास करना चाहिए, इस शंका पर कहते…
  33. Verse 36जीवन धारण कर रहे प्राणियों के चित्त का भला कैसे त्याग हो सकता है । इसलिए चुपचाप बैठे रहने…
  34. Verse 37इससे भिन्न किसी दूसरे मार्या से कर्म का त्याग अत्यन्त कठिन हैं, यह कहते हैं / इससे अन्य द…
  35. Verse 38बोध होने के बाद दृश्य-प्रतिभास का स्वयमेव लय होने से जो जगत्‌ का अत्यन्तअभाव होता है उसी…
  36. Verse 39बोध से तो वेच्य का ही बाध होता है, केदन का नहीं. फिर उसका बाध कैसे कहते हैं; यदि यह कोई आ…
  37. Verse 40चिदाभासतारूप वेद्योन्मुखता का परित्याग कर जो वेदन का शुद्ध चिदात्मकरूप अवशिष्ट रहता है वह…
  38. Verse 41की नाईं वह विकास को प्राप्त हुआ है । यही कारण है कि अनुभवी विद्वान लोग मोक्ष को चिदाभासशू…
  39. Verse 42इस तरह यह सिद्ध हो गया हे कि जब तक यह शरीर खड़ा है तब तक छुखपूर्वक व्यवहार होता ही रहेया,…
  40. Verse 43अपने कर्म का मूल वासनात्मक मन सम्बन्धी चिदाभास संवित्‌ ही है। उसका उच्छेद जब तक यह शरीर ह…
  41. Verse 44हे श्रीरामजी, यही चिदाभाससंवित्‌ भीतर अन्य कर्मों के मूल काम, वासना आदि को पैदा करने में…
  42. Verse 45इसलिए मेरे द्वारा कहा गया ही सरके बढ़िया कर्मत्याय में उपाय है, इस आशय से कहते हैं / जो त…
  43. Verse 46जो चिदाभास को शुद्ध आत्मदृष्टि से विचारकर विचलित कर देता है वह संसाररूपी वृक्ष का तत्त्वज…
  44. Verse 47हे श्रीरामजी, चूँकि चिति के अभाव से रहित, सजातीय और विजातीय भेदों से शून्य, दृश्य पदार्थो…