Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
शुभाशुभं नाशनीयं स्वकर्म खलु धीमता ।
मूलकाषविनाशेन तच्च नष्टं भवत्यलम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
कर्म का स्वरूप ओर उसके नाश का प्रकार, जो अपने को अभिप्रेत है, श्रीरमजी बतलाते हैं /
बुद्धिमान् पुरुष को उचित है कि वह अपने पुण्य और पापरूप कर्मों को नष्ट कर दे और मूल
उखाड़कर नाश कर देने से वे बिलकुल नष्ट भी हो सकते हैं