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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यच्चेत्यते नु तेनाशु बहिरन्तश्च भूयते । सत्याकारमसत्यं वा भवत्वाहितविभ्रमम् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

देह के विद्यमान रहते बाह्य और आभ्यन्तर दृश्यों के अध्यास को दूर करना अत्यन्त ही कठिन हैं, यह कहते हैं । देह रहते बाह्य ओर आभ्यन्तर जिस-जिस की यह जीवचेतन भावना करता है उसी रूप का यह शीघ्र हो जाता है, चाहे वह सत्याकार हो या विभ्रम से भरा हुआ बिलकुल असत्य ही क्यों न हो ?