Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verses 23–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verses 23–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
तेषां मूलं बृहत्स्तम्भं मनो व्याप्तजगत्त्रयम् ।
पञ्चस्रोतःशिराकृष्टमुक्तानन्तरसद्रवम् ॥ २३ ॥
तस्य मूलं विदुर्जीवं चेत्योन्मुखचिदात्मकम् ।
चेत्यस्य चेतनं मूलं सर्वमूलैककारणम् ॥ २४ ॥
चितेस्तु ब्रह्म मूलं यत्तस्य मूलं न विद्यते ।
अनाख्यत्वादनन्तत्वाच्छुद्धत्वात्सत्यरूपिणः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
उन ज्ञानेन्द्रियों का भी
महान् स्तम्भयुक्त मूल यह मन है, इसने तीनों लोक को व्याप्त कर रक्खा है तथा यही अनन्त
रूपादि रसद्रवों को पांच ज्ञानेन्द्रियों के स्रोतरूपी नाड़ियों के द्वारा खींचकर उनका उपभोग कर
लेने के बाद फिर उन्हें फेंक देता है