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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अद्वैतैक्यं विमननं शान्तमात्मन्यवस्थितम् । यथा पङ्कमयं सैन्यं तथा शिवमयं जगत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्व शिवमयं शान्तमनन्त प्राग्वदास्यताम्‌” (सक अज. शान्त, अनन्त तथा शिवमय ब्रह्म ही है, इसलिए हे श्रीरामजी, आप जे पहले थे वैसे ही स्थित रहिये) यह जो कहा गया है, उसका यहाँ उपपादन करने के लिए पहले प्रतिज्ञा करते हैं / श्रीरामचन्द्रजी, द्रैतता ओर एकता से रहित, मननशून्य, शान्त आत्मा ही अपने पारमार्थिक स्वभाव में तत्त्व-दृष्टि से अवस्थित है । जिस तरह मिट्टी की सेना मिड़ीमय है उसी तरह शिव का यह सारा संसार शिवमय हे

सर्ग सन्दर्भ

पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्ग सम्पूर्ण जगत्‌ में शिवमयरूपता बतलाने के बाद कर्म के बीज का अन्वेषण करके उसका समूल निवारण किया जाता है, यह वर्णन ।