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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

सुदूरमपि जातानि पञ्चस्तम्बानि तानि तु । वासनापङ्कमग्नानि रसवन्ति महान्ति च ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानेन्द्रियाँ देह से बाहर बहुत दूर विषय प्रदेशों में जाकर भी विषयों को पकड़ लेने में अत्यन्त समर्थ हैं, नेत्रगोलक आदि पांच तरह के स्थानों में वे आश्रित हैं और अपने-अपने विषय-वासनारूपी कीचड़ में निमग्न अतएव वासनायुक्त हैं तथा उन्हे निगृहीत करना शक्य नहीं है - काबू के बाहर है