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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सर्वेषां कर्मणामेवं वेदनं बीजमुत्तमम् । स्वरूपं चेतयित्वान्तस्ततः स्पन्दः प्रवर्तते ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भगवान्‌, उस मन का मूल तत्त्वज्ञानी लोग चेत्य (विषय) की ओर उन्मुख हुए चिदात्मक जीव को (चिदाभास को) कहते ह । चेत्यांश का मूल अविद्याशबल (मायाशबल) चिति है। उस चिदाभासरूप चिति का भी मूल बिम्बभूत ब्रह्म है, जो सब मूलो का एक कारण है । हे ब्रह्मन्‌, चूँकि वह अशब्द, अनन्त, शुद्ध ओर सत्यस्वरूप है, इसलिए उस ब्रह्म का कोई दूसरा मूल नहीं है ॥२४.२५॥ हे महर्ष, इस तरह सम्पूर्ण कर्मों का मूल विषयों की ओर उन्मुख हुई चिति ही है । वह अहंकारादि के साथ तादात्म्यापन्न होकर "मैं ही सब कुछ करती हूँ यों कर्ता के स्वरूप की भावना करके क्रियात्मक स्पन्द बनकर उसके फल के लिए प्रवृत्त होती है