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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अहंममेत्यसद्रूपं ज्ञस्याभावयतः प्रभो । अशुभं कर्मणां त्यागादनुष्ठानाच्च किं शुभम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अनन्त कोटि जन्मों के सवित पाप और पुण्यरूफी कर्मो का अपरोक्षरूप से भान न होने के कारण शिवमयताअवलोकन द्वारा बाध भिद्ध तो हो नहीं सकता, इसलिए अन्ततोयत्वा जब तक मृत्यु न हो जाय तब तक चेष्टाशून्य होकर रहनाऊृप ही उनका त्याय एकमात्र उनके निवारण में उपाय है, क्योंकि ज्ञानी पुरुष को कर्म करने से न तो कोई फ़ल गिलने की अपेक्षा हैं और न नित्य एवं नैमित्तिक कर्मो के त्याग से प्रत्यवाय लगने की ही आशा हैं, जिससे कि चुपचाप स्थित रहना उससे न हो सकेगा, ऐसी सम्भावना करके श्रीरामजी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, “अहं “मम” इत्यादि दृश्यसमूह की असद्रूप से भावना कर रहे ज्ञानी पुरुष को कर्मों के त्याग से क्या अशुभ होता है तथा उनके अनुष्ठान से क्या शुभ होता है ?