Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 2, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 2 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
कर्मणः परिफुल्लस्य देहरूपतयेति हि ।
कर्मेन्द्रियाणि मूलानि दुष्टानि ग्रन्थिमन्ति च ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह देह
वृक्षरूप से उत्पन्न हुए पूर्व जन्म के कर्म की कर्मेन्द्रियाँ ही मूल है । (इनमें वृक्षयल के धर्म
दिखलाते हैं / इनमें जो छिद्रों से युक्त हैं, वे तो आसंग-कामादिरूपी साँपों से से गये हैं
और जो बिना छिद्रों के हैं उनमें भी बड़ी-बड़ी गाँठें पड़ गई हैं