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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 185

एक सौ तिरासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौरासीवाँ सर्म घर के अन्दर कोटि-कोटि आठ जगतो का संभव है, क्योकि अज्ञात चिन्मात्र का ही जगतां के रूप से भान होता है, यह वर्णन ।

19 verse-groups

  1. Verses 1–3कुन्ददन्त ने कहा : मेरे यह पूछने पर कि भगवन्‌, घरों के छोटे से अवकाश में उन पचास करोड योज…
  2. Verse 4कुन्ददन्त ने कहा : भगवन्‌, अद्वितीय, निर्मल, शान्त, शिव परम कारण में स्वभावसिद्ध (नैसर्गि…
  3. Verses 5–6यह नानाता वास्तविक नहीं है, किन्तु भ्रान्तिजन्य है, वह जैसे चन्द्रमा के एक होने पर भी दो…
  4. Verses 7–12इसलिए कोई विरोध नहीं है, यह दशति है। स्पन्दसहित होने पर भी वह निस्पन्द है पर्वत होने पर भ…
  5. Verse 13जैसे स्वाप्नाकाश मेँ स्तम्भ के न रहने पर भी जीवचित्‌ की स्तम्भता प्रतीत होती है वैसे ही य…
  6. Verses 14–17तब अर्थ क्रिया का नियम कैसे है 2 इस प्रश्न पर कहते हैं। आदि सृष्टि में पदार्थता स्वभाव से…
  7. Verses 18–24इस अध्यात्मशास्त्र के बोध से परमार्थरूप परम ब्रह्म ओर जगत्‌ यह एक ही है यह निश्चय होता है…
  8. Verse 25कैसे उनका भान होता है ? यह कहते हैं। जैसे दही आदि द्रव्य में शक्कर आदि मिला दिया जाय तो म…
  9. Verse 26इसलिए घट, पट आदि पदार्थ भी अपने अधिष्ठानभूत चित्‌ की सत्ता और स्फूर्तिवाले होने से चिन्मा…
  10. Verse 27उनकी स्थिति भी संवित्‌ के अनुसार ही है। स्पन्दशून्य चिदाधिष्ठानवाली होने के कारण सब द्रव्…
  11. Verses 28–31इस प्रकार एकमात्र प्रतिभास के अधीन सर्वस्ववाला यह जगत्‌ प्रातिभासिक ही है, इस आशय से कहते…
  12. Verses 32–34उसकी काल ओर प्रकार की व्यवस्था भी संकल्प के अनुसार ही होती है, ऐसा कहते हैँ । जैसे संकल्प…
  13. Verses 35–38प्राणियों के जन्म, कर्म, स्वभावादि की व्यवस्था भी उसी से होती है यह कहते है । उक्त नियति…
  14. Verse 39हम सव लोगों का व्यवहार ब्रह्मा के संकल्परूप नियति से सुव्यवस्थित हो, लेकिन ब्रह्मा की संक…
  15. Verses 40–41ब्रह्मा का संकल्प स्मरण के अधीन नहीं है किन्तु दिव्य ज्ञान द्वारा अतीत अनागत सकल वस्तुओं…
  16. Verse 42दर्शन की सामर्थ्य न होने पर स्मृति की कल्पना करनी पडती है । स्वप्न में केवल कल्पना से दर्…
  17. Verse 43अतएव गुण, दोष आदि में स्मरण से हर्ष, क्रोधरहित तत्त्वज्ञानी कुम्हार के चाक की तरह प्रारब्…
  18. Verses 44–45बाधित स्मृति स्मृति नहीं है किन्तु वह अधिष्ठानमात्र का परिशेष है, ऐसा कहते हैं। निद्रा की…
  19. Verses 46–48क्योकि सब प्रकार शान्त चित्‌ ही सब कुछ है, यह कहते हैं। जिसमें सब है, जिससे सब है, जो सब…