Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 39
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हम सव लोगों का व्यवहार ब्रह्मा के संकल्परूप नियति से सुव्यवस्थित हो, लेकिन ब्रह्मा की
संकल्पव्यवस्था ही पूवानुभवजन्य संस्कार से अतिरिक्त हेतुका संभव न होने तथा आदि सृष्टि में
पूवानुभव के प्रसिद्धि न होने के कारण कैसे सिद्ध हो सकती है, यों कुन्ददन्त शंका करता है।
कुन्ददन्त ने कहा : भगवन्, पहले देखी गई वस्तु स्मृति-पथ में आरूढ होती हे उसके अनन्तर
तदनुसार संकल्प होते है । उक्त संकल्पं से नियत सृष्टि का भान होता है । यह बात द्वितीय, तृतीय
आदि कल्पों की सृष्टि में संभव हे । किन्तु आदि सृष्टि में किसको पूर्वसूष्टि का भान प्रसिद्ध है जिससे
कि ब्रह्माजी पूछें अथवा स्वयं स्मरण करें