Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 18–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 18–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 18-24
संस्कृत श्लोक
स एष कुन्ददन्ताख्यो मम पार्श्वगतो द्विज ।
अद्य निःसंशयो जातो न वेति परिपृच्छ्यताम् ॥ १८ ॥
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्ते राघवेणाथ प्रोवाच वदतांवरः ।
स वसिष्ठो मुनिश्रेष्ठः कुन्ददन्तं विलोकयन् ॥ १९ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
कुन्ददन्त द्विजवर कथ्यतां किं त्वयानघ ।
बुद्धं श्रुतवता ज्ञेयं मदुक्तं मोक्षदं परम् ॥ २० ॥
कुन्ददन्त उवाच ।
सर्वसंशयविच्छेदि चेत एव जयाय मे ।
सर्वसंशयविच्छेदो ज्ञातं ज्ञेयमखण्डितम् ॥ २१ ॥
ज्ञातं ज्ञातव्यममलं दृष्टं द्रष्टव्यमक्षतम् ।
प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं विश्रान्तोऽस्मि परे पदे ॥ २२ ॥
बुद्धेयं त्वदिदं सर्वं परमार्थधनं घनम् ।
अनन्येनात्मनो व्योम्नि जगद्रूपेण जृम्भितम् ॥ २३ ॥
सर्वात्मकतया सर्वरूपिणः सर्वगात्मनः ।
सर्वं सर्वेण सर्वत्र सर्वदा संभवत्यलम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस अध्यात्मशास्त्र के
बोध से परमार्थरूप परम ब्रह्म ओर जगत् यह एक ही है यह निश्चय होता है, वही मुक्ति है । ब्रह्मा
संकल्प करनेवाले चिदाकार के संकल्प का स्वरूप हे । वही जगत् का रूप है, इसलिए जगत् ब्रह्मस्वरूप
हे । जिसमें वाणिर्यो निवृत्त होती हैं (जहाँ वाणियों की पहुँच नहीं है) अथवा सकल शब्दों के ब्रह्मनिष्ठ
होने से जिससे निवृत्त वाणिर्यो होती ही है वैसे ही विधिर्यो, निषेध और भावअभावदृष्टर्यो जिससे
निवृत्त होती हैं अथवा सबके एकमात्र तदाश्रित होने से उक्त विधि आदि जिससे निवृत्त नहीं ही होते
हैँ । अमोन मौन के मध्य में जीवात्मा की जो पाषाण के समान चिद्घन स्थिति है, जो सत् होते हुए ही
असत् के सदुश प्रतीत होता है वह ब्रह्म नाम का कहा जाता है । सर्वात्मा अद्वितीयसुघन निरामय ब्रह्म
में ही भाव अभाव आदि वस्तु की क्या सृष्टि होगी ओर क्या प्रलय होगा ? जैसे एक ही अविचित्र निद्रा में
विचित्र-सी अविच्छिन्न सुषुप्ति और स्वप्न की भ्रान्तियों का भान होता है वैसे ही इस अविचित्र
चिदाकाशसत्ता में बहुत से विचित्र अविच्छिन्न बीजभूत प्रलयो ओर सर्गो का भान होता हे