Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 32-34
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उसकी काल ओर प्रकार की व्यवस्था भी संकल्प के अनुसार ही होती है, ऐसा कहते हैँ ।
जैसे संकल्पनगर जब तक संकल्प किया जाय ओर जिस जिस प्रकार से संकल्प किया जाय
तब तक और उस उस प्रकार से स्फुरित होता है वैसे ही यह जगत् भी जब तक तथा जिस प्रकार
इसका संकल्प किया जाय तब तक उस प्रकार स्फुरित होता है । जैसे कि संकल्पनगर में
संकल्पपर्यन्त सकल स्थिति, जो असद्रूप होने पर भी सत् के समान अनुभव में आती है, अवश्यमेव
रहती है । वही ब्रह्मा की संकल्परूप नियति, जो नियत अर्थ का प्रदान करती है आज भी
धाराप्रवाहरूप से चलती है आगे भी अवश्य ही चलेगी । उसी से स्थावर ओर जंगम आदि प्राणिसंच
नियमितरूप से रहता है