Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 7–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 7–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 7-12
संस्कृत श्लोक
ततोऽहं दुःखितो भूयः कदम्बतरुतापसम् ।
गतो दुःखोपघाताय तज्ज्ञानं प्रष्टुमादृतः ॥ ७ ॥
तत्र मासत्रयेणासौ समाधिविरतोऽभवत् ।
प्रणतेन मया पृष्टः सन्निदं प्रोक्तवानथ ॥ ८ ॥
कदम्बतापस उवाच ।
अहं समाधिविरतः स्थातुं शक्नोमि न क्षणम् ।
समाधिमेव प्रविशाम्यहमाशु कृतत्वरः ॥ ९ ॥
परमार्थोपदेशस्ते नाभ्यासेन विनानघ ।
लगत्यत्र परां युक्तिमिमां शृणु ततः कुरु ॥ १० ॥
अयोध्यानाम पूरस्ति तत्रास्ति वसुधाधिपः ।
नाम्ना दशरथस्तस्य पुत्रो राम इति श्रुतः ॥ ११ ॥
सकाशं तत्र गच्छ त्वं तस्मै कुलगुरुः किल ।
वसिष्ठाख्यो मुनिश्रेष्ठः कथयिष्यति संसदि ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए कोई विरोध नहीं है, यह दशति है।
स्पन्दसहित होने पर भी वह निस्पन्द है पर्वत होने पर भी पर्वत नहीं है जैसे स्वप्नो में चिदृभाव
पदार्थगत है वैसे ही सन्मात्रआत्मा चिद्भाव कल्पितार्थ भी हे, यह समझना चाहिये । सर्वात्मा के
अनुरूप यानी वास्तविकरूप में न सृष्टि आदि स्वभाव हैँ और न सृष्टि स्वभाव से किये गये पदार्थ
हँ । सृष्टि के आदि में जो रूप जैसे स्फुरित हुआ वह आज भी वैसा ही स्थित है । परमरूप कचन
अकचन स्वरूप (स्फुरण-अस्फुरणरूप) नहीं है द्रव्य रूप से अचित् भी नहीं हे । केवल चिदाकाश
इस प्रकार से (जगत् के रूप से) स्थित हे । जैसे स्वप्न मेँ केवल एकमात्र निर्मल जीवचिति सेनारूपमें
लाखों मनुष्यरूपता को प्राप्त हुई सी प्रतीत होती है वैसे ही इस चिति की पदार्थता स्फुरित होती
है । चकि चिदाकाश स्वच्छतम अपने स्वरूप में अपने आप अतिशयरूप से देदीप्यमान होता है
इसलिए उसके द्वारा स्फुरणाकार का जगत्रूप से अनुभव होता हे । जैसे स्वप्न में अग्नि के न रहने
पर भी स्वप्नचिति ही उष्णरूप से भासित होती है वैसे ही संवितूमात्ररूप आकाश में असत् भी
पदार्थ अपने स्वरूप को भासित करता है