Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 35–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 35–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 35-38
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
प्राणियों के जन्म, कर्म, स्वभावादि की व्यवस्था भी उसी से होती है यह कहते है ।
उक्त नियति से ही जिसमें स्फुट जीव है ऐसे जंगम से जंगम की उत्पत्ति होती है ओर स्थावर से
स्थावर की उत्पत्ति होती हे, जल नीचे की ओर बहता है ओर अग्नि ऊपर को धधकती है । उसी नियति
के कारण ही सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतिर्यो देह-यन्त्र धारण करती हैं ओर तपती हैं । वायु सदा गतिशील
रहते हैं और पर्वत आदि स्थिर (अचल) रहते हैँ । उसी नियति से ज्योतिर्मय युग, संवत्सर आदि रूप
कालचक्र दक्षिणायनरूप से लौटकर वर्षा ऋतु में आकाश को मूसलाधार वृष्टि से व्याप्त करता हुआ
चलता हे । नियति से ही भूतल में एक के बाद एक सागर ओर पर्वतो का संनिवेश स्थिर सा होता है तथा
भाव, अभाव, ग्रहण त्यागरूप द्रव्य शक्ति भी रहती हे