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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 40–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 40,41

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा का संकल्प स्मरण के अधीन नहीं है किन्तु दिव्य ज्ञान द्वारा अतीत अनागत सकल वस्तुओं के दर्शन के अधीन है, क्योकि “स एत लोकान्नु सृजा इति स इमान्‌ लोकानसृजत” इत्यादि श्रुति है। उस क्षण में सब अतीत और अनागत जगत्‌ अपूर्वद्ृष्ट ही दिखाई देता है और दृष्ट की अनुसारिणी विद्‌ विवर्तरूप सांकल्पिक सृष्टि प्रवृत्त होती है । उसी में यह मैंने प्रागूद्ृष्टम्‌” (पहले देखा) यों कहीं पर अभ्यास भी किया है इस तरह तपस्वी शंका का समाधान करते हैं। स्वप्न मेँ स्वमरण के तुल्य अपूर्वं ही सब कुछ दिखाई देता है उसी में पहले देखा गया, यों अभ्यासवश ब्रह्मा को स्मृति होती है । चित्‌ होने के कारण जगत्रूपी संकल्पनगर चिदाकाश मेँ स्फुरित होता है । चूँकि वह स्वतः कभी भासित होता है ओर कभी भासित नहीं होता, इसलिए वह न सत्‌ है ओर न असत्‌ है