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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

कुन्ददन्त उवाच । जरन्मुनिरपीत्युक्त्वा ध्यानमीलितलोचनः । आसीदस्पन्दितप्राणमनाश्चित्र इवार्पितः ॥ १ ॥ आवाभ्यां प्रणयोदारैः प्रार्थितोऽपि पुनःपुनः । वाक्यैः संसारमविदन्न वचो दत्तवान्पुनः ॥ २ ॥ आवां प्रदेशतस्तस्माच्चलित्वा मन्दमुत्सुकौ । दिनैः कतिपयैः प्राप्तौ गृहं मुदितबान्धवम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

कुन्ददन्त ने कहा : मेरे यह पूछने पर कि भगवन्‌, घरों के छोटे से अवकाश में उन पचास करोड योजन विस्तारवाले जगतों का कैसे भान हुआ ? कदम्बतलनिवासी उस तपस्वी ने यह कहा : यह चिदाकाश ऐसा ही है । सर्वव्यापी यह प्रपंचशून्य होने पर भी जहाँ-जहाँ रहता है, वहाँ वहाँ अपने स्वरूप को अपने में त्रिलोकी के रूप से अथवा सुषुप्त ओर तुरीय के रूप से अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूप का त्याग किये विना ही देखता है

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तिरासीवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौरासीवाँ सर्म घर के अन्दर कोटि-कोटि आठ जगतो का संभव है, क्योकि अज्ञात चिन्मात्र का ही जगतां के रूप से भान होता है, यह वर्णन ।