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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 14–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 14–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 14-17

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा स समाधानरसायनमहार्णवम् । विवेशाहमिमं देशं त्वत्सकाशमुपागतः ॥ १४ ॥ श्रीराम उवाच । स कुन्ददन्त इत्यादिकथाकथनकोविदः । स्थितस्ततःप्रभृत्येव मत्समीपगतः सदा ॥ १६ ॥ स एष कुन्ददन्ताख्यो द्विजः पार्श्वे समास्थितः । श्रुतवान्सहितामेतां मोक्षोपायाभिधामिह ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

तब अर्थ क्रिया का नियम कैसे है 2 इस प्रश्न पर कहते हैं। आदि सृष्टि में पदार्थता स्वभाव से स्वच्छ ही थी । चिदाकाश ने जिसका जैसे अनुभव किया वह आज भी अपने स्वरूप का वैसे ही लाभ करता है । जैसे फूल, पत्ते, फल और तने में वृक्ष ही व्याप्त है वैसे ही सर्वत्र सारा जगत्‌ सर्वात्मा परब्रह्म ही है । सृष्टि परम्परा परमार्थं आकाशरूपी (चिदाकाशरूपी) सागर में जलरूप है तथा सृष्टिसंवित्‌ परमार्थरूप महाकाश में शून्यतारूप है अर्थात्‌ जैसे जल सागर से अभिन्न है ओर जैसे शून्यता आकाश से अभिन्न है वैसे ही परम ब्रह्म से सृष्टियाँ अभिन्न हैं | जैसे तरु ओर वृक्ष पर्यायवाची हे वैसे ही परमार्थ और सृष्टि पर्यायवाची (अभिन्नार्थ) है । बोध होने से इस तरह अद्वैत होता है और बोध न होने से तो केवल दुःख के लिए द्वैत ही है