Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अथ तत्रोत्सवं कृत्वा कथाः प्रोच्य चिरंतनीः ।
स्थितास्तावद्वयं यावत्सप्तापि भ्रातरोऽथ ते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
कुन्ददन्त ने कहा : भगवन्, अद्वितीय, निर्मल,
शान्त, शिव परम कारण में स्वभावसिद्ध (नैसर्गिक) वास्तवी नानाता (भिन्नता) कैसे स्थित हे ? एक
में नानाता विरुद्ध है यह शंका करनेवाले का भाव है