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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 28-31

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार एकमात्र प्रतिभास के अधीन सर्वस्ववाला यह जगत्‌ प्रातिभासिक ही है, इस आशय से कहते हैं। यद्यपि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सहित यह सारा जगत्‌ अविद्यमान ही है फिर भी स्वप्न की तरह दिखाई देता है और अनुभव में आता है । स्थावर जंगम स्वरूप चित्रूपी जलमें हर्ष, क्रोध और विषाद से अत्यन्त विचित्र स्पन्द रीतियाँ दिखाई देती हैँ । स्वभावरूप अर्थात्‌ अज्ञातस्वरूपनिष्ठ विक्षेपशक्तिरूप वायु से कँपाये गये, जगत्‌जालाकार चमत्कार से युक्त चित्‌, की जो सत्त्वगुणरूप प्रकाश से किरणरूप हैँ, रजोगुण से धूलिराशिरूप है, आवरण और जाञ्यप्रधान तमोगुण से मेच और कुहरारूप है, आकाश में विस्तारशीलता खेदजनक है अर्थात्‌ किस किस प्रकार के जन्म, मरण आदि करोड़ों अनर्थो के रूप से सम्पन्न है । जैसे रोगाक्रान्त दुष्टिवाले पुरुष को आकाश में केशों का वर्तुलाकार गोला दिखाई देता है वैसे ही अज्ञानावृत्त चिद्दृष्टिवाले पुरुष को स्वात्माकाश में इस जगदभरान्ति का भान होता है