Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 163
एक सौ इकसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बासठवाँ सर्ग समस्त द्वैत का ब्रह्ममात्रत्व वर्णन द्वारा अविद्या का निराकरण करना |
16 verse-groups
- Verse 1सकल दृश्य का चिदाकाश के लिए ही स्फुरण होता है, इसीलिए भी चिन्मात्र परिशेष है, ऐसा कहते है…
- Verse 2चिद् के भोग्य की चिन्मात्रशेषता किस दृष्टान्त से आप सिद्ध करते हैं ? ऐसा प्रश्न उपस्थित…
- Verse 3यदि नाना (द्वैत) नहीं है तो जो नाना-सा मालूम पड़ता है वह क्या है ? इस पर कहते हैं। चित्…
- Verse 4उसकी समता को ही ओर अधिक स्पष्ट करते है। सृष्टि के पूर्व की (प्रलयकाल की) तरह इस समय भी चि…
- Verse 5चन्द्रमा की प्रादेशिकता यानी चन्द्रमा केवल वित्ताभर है यह जैसे चन्द्रमण्डल के विस्तार को…
- Verse 6ऐसा कैसे ? ऐसा कोई कटे तो इस पर कहते है । चूँकि तत्त्वज्ञानी केवल अन्तर्दृष्टि हैं और अज्…
- Verse 7उक्त अर्थ का ही उपपादन करते हैं। सर्ग शब्द का अर्थ जैसा स्वबुद्धि में स्थित होता है वैसा…
- Verses 8–10जब भ्रान्त और अश्रान्त दोनों से प्रपंच का दीखना संभव नहीं है, तो प्रपंच अस्तित्व कैसे प्र…
- Verses 11–12देह में आत्मभ्रान्ति ही सव दुःखो का मूल है, ऐसा कहते हैं। यह केवल तुच्छ शरीर एकमात्र भ्रा…
- Verses 13–15तब मैं राम हूँ, आप वसिष्ठजी हैं इत्यादि देहात्मव्यवहार, शब्द और अर्थ कैसे है ? इस संशयपर…
- Verse 16इसलिए सदा ही एकरूप चिदाकाश ही मैं हूँ यों अपने को आप परम शान्त निर्वेत्तिरूप जानिये ऐसा क…
- Verse 17एकमात्र शुद्ध बोधरूप आत्मविश्रान्ति द्वारा जीव में प्रसिद्ध मनोविक्षेप का त्याग कीजिये, ज…
- Verses 18–25अतएव आत्मविचार से अपना उद्धार कीजिये, ऐसा कहते हैं। निस्सन्देह जीव आप ही अपना बन्धु है और…
- Verse 26यह दृश्य ब्रह्म ही है, यों यथार्थ विज्ञान होनेपर यह भय, क्लेश आदि नहीं देती | यह दृश्य यथ…
- Verses 27–28यदि कोई कहे कि स्पष्ट अनुभव होने के कारण सत्यता को प्राप्त हुए जगत् की ज्ञानमात्र से कैस…
- Verses 29–56वह तत्त्वज्ञान मन के साथ इन्द्रियोपर विजय पाये बिना नहीं पराप्त हो सकता, यह दिखलाते हुए उ…