Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रं पुरुषं विद्धि चेतनाज्जीवनामकम् ।
यच्चेतति स जीवोऽन्तस्तन्मयो भवति क्षणात् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी समता को ही ओर अधिक स्पष्ट करते है।
सृष्टि के पूर्व की (प्रलयकाल की) तरह इस समय भी चिदाकाशरूप जगत् का स्वप्ननगर ओर
गन्धर्वनगर के समान भान ही हुआ है और उसी तरह वह असत्य भी है इसलिए स्वप्ननगर ओर गन्धर्वनगर
के पदार्थ से उसकी समता है, यह अर्थ हे