Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verses 13–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
संविद्रसिकतास्वन्तस्तथा नीरसतासु च ।
यस्य नोद्वेगमायाति मनस्तस्योपशाम्यति ॥ १३ ॥
संवित्प्रयत्नसंरोधान्मनः स्वायनमुज्झति ।
चेतश्चपलतोन्मुक्तं विवेकमनुधावति ॥ १४ ॥
विवेकवानुदारात्मा विजितेन्द्रिय उच्यते ।
वासनावीचिवेगेन भवाब्धौ न स मुह्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब मैं राम हूँ, आप वसिष्ठजी हैं इत्यादि देहात्मव्यवहार, शब्द और अर्थ कैसे है ? इस संशयपर
कहते हैं।
जैसे पृथिवी में मोटा बाँस का डंडा चीरनेपर उसके अन्दर पहले से स्थित शब्द बाहर निकलता
हुआ-सा मालूम पड़ता है किन्तु उसके अन्दर शब्द न तो था और न निकला वैसे ही जल में तरंगों से,
अग्निमें ज्वाला आदि से, आकाश में प्रतिध्वनि शब्द और वायु से कण्ठ, तालु आदि प्रदेशों में वर्णस्फोट,
पदस्फोट ओर वाक्यस्फोट निकले हुए से मालूम पड़ते हैं लेकिन वे उनके अन्दर पहले से नहीं हैं वैसे ही
वासनामय पदार्थ भी अग्नि से चिनगारियों की तरह जाग्रत और स्वप्न में आत्मा से निकले हुए से प्रतीत
होते हैं लेकिन वे उसमें हैं नहीं । सृष्टि के आरम्भ से स्वात्मचित् ही स्वप्न के पर्वत के समान स्फुरित
होता है वास्तव में तो न शब्द है, न अर्थ है और न दृश्यता ही है। जो यह है और जो भासित होता है वह
सब परमार्थ सत् ही है। सत् से अतिरिक्त रूप तो सृष्टि के आदि में ही, कारण का अभाव होने से,
उत्पन्न ही नहीं हुआ