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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

स्वसंविद्यत्नसंरोधाद्यथा चेतः प्रशाम्यति । न तथाङ्ग तपस्तीर्थविद्यायज्ञक्रियागणैः ॥ ८ ॥ यच्च संवेद्यते किंचित्तत्तत्संविदि संविदा । नूनं विस्मार्यते यत्नाद्भोगानामिति तज्जयः ॥ ९ ॥ स्वसंवेदनयत्नेन विषयामिषतोऽनिशम् । किंचित्संरोधिता संवित्तत्प्राप्तं वैबुधं पदम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

जब भ्रान्त और अश्रान्त दोनों से प्रपंच का दीखना संभव नहीं है, तो प्रपंच अस्तित्व कैसे प्राप्त हुआ ? इस प्रश्नपर कहते हैं। जैसे तरंगें नदी के जल में जलद्रव के रूपसे स्थित होती हैं वैसे ही सृष्टिरूपी तरंगें अज्ञात चित्‌ स्वभाव का ही अवलम्बन कर आत्मसत्ता से ही चित्‌ में स्थिति को प्राप्त हुई हैं जो केवल चित्‌चमत्काररूप है उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है, वही जगत्‌ के रूप से स्थित है जैसे स्वप्ननगरों में अदृश्य भी वस्तुजात दृश्य-सा प्रतीत होता है वैसे ही यह भी अदृश्य होता हुआ ही दृश्य-सा मालूम होता हे । यह चित्‌ की प्रभा ही जगत्‌ नाम से स्फुरित होती है । यह अमूर्त (निराकार) होती हुई ही दर्पण में घट, पट आदि पदार्थो की छाया के समान मूर्तिमती-सी होकर व्याप्त है