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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 163, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 163 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । न च प्रभूतभोगेषु न पुंस्त्वे न च जीविते । न चेन्द्रियजयोन्मुक्तौ दीपस्तनुदृशो यथा ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

चिद्‌ के भोग्य की चिन्मात्रशेषता किस दृष्टान्त से आप सिद्ध करते हैं ? ऐसा प्रश्न उपस्थित होनेपर कहते हैं। चूँकि स्वप्न में नगर का भोग करनेवाली चिति के ही नगररूप होने से चिति से अतिरिक्त कुछ नहीं है, इसलिए जाग्रत्‌-जगत्‌ भी आकाश की तरह शान्त है। यहाँपर नाना (भेद) कुछ भी नहीं है